(3) वानप्रस्थ और Art of Leaving.
पंकज खन्ना
9424810575
पिछले अंक से जारी...
जाबालोपनिषेद के अनुसार वानप्रस्थ आश्रम के मुख्य कर्तव्य हैं: आत्मिक उन्नति, मोह-माया का त्याग, संन्यास की तैयारी, तपस्या, स्वाध्याय, समाज सेवा, और वैदिक ज्ञान का प्रचार।
बहुत मुश्किल काम हैं ये तो! सांसारिक मोह तो हमारे देश में सर्वत्र व्याप्त प्रसिद्ध धनाढ्य आदरणीय बाबा लोगों से नहीं छूटा, हमसे क्या छूटेगा!? हम बस मोह माया में थोड़ी कमी कर दें तो वो भी हमारे लिए एक बहुत बड़ी सफलता होगी।
हमें तो बस ये लगता है कि इस वानप्रस्थ के चरण में एक साधारण व्यक्ति राग-द्वेष से दूर रहकर, संतोषी भाव से, मस्त रहते हुए ज्ञान और अनुभव का उपयोग समाज के मार्गदर्शन, आनंद और उत्थान के लिए कर सके तो शायद उसका जीवन कुछ हद तक सफल हो जाए। पिछले कुछ सालों से, वानप्रस्थ में प्रवेश के बाद से ही, यही कोशिश की जा रही है इन ब्लॉग्स के माध्यम से!🙏
वानप्रस्थ शब्द का मतलब है: वन में प्रस्थान करना" या "वनवासी हो जाना"। अब लोगों के बसने के लिए तो कोई वन बचे नहीं हैं, तो हमेशा के लिए वन में प्रस्थान असंभव है। अगर आप चले भी गए तो जंगलात विभाग के लोग आपको हकाल देंगे!
गांव या शहर में घर के किसी एकांत वाले स्थान या वृद्धाश्रम में भी वानप्रस्थ किया जा सकता है। वैसे आप कहीं भी रहें बड़े से बंगले में या छोटी सी झोपड़ी में, अधिकांश जिंदगी तो दिमाग में ही जी जाती है। वानप्रस्थ भी दिमाग में अच्छे से जिया जा सकता है बगैर वन में प्रस्थान किए।💐🙏
वानप्रस्थ का सारांश अगर ढूंढें तो वो है :त्याग वृत्ति। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य की प्रमुख इच्छाओं जैसे वित्तैषणा, लोकेषणा, और पुत्रैषणा आदि का त्याग ही वानप्रस्थ है। इन तीनों के बारे में संक्षेप में थोड़ा समझ लेते हैं:
वित्तैषणा: वित्त' का मतलब धन और 'एषणा' का अर्थ कामना या इच्छा है, इसलिए वित्तैषणा का सीधा अर्थ, 'अर्थ' या धन की इच्छा है। इसे उन इच्छाओं में से एक माना जाता है जो मनुष्य के मोक्ष के मार्ग में बाधा डालती है और जो व्यक्ति को कभी भी संतुष्ट नहीं होने देती है।
आप वित्तैषणा से इस जीवन में शायद ही पार पा सकें। पर इसमें कमी जरूर कर सकते हैं! हम भी इसमें थोड़े सफल जरूर हुए हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी, और बहुत लोगों के ताने सुनने के बाद भी कमाने की और कोशिश नहीं कर रहे हैं। वैसे, जब कमाने के दिन थे तब कुछ खास नहीं कर पाए तो अब सठियाने के बाद क्या उखाड़ लेंगे!?
लोकेषणा: मान-सम्मान, पद, प्रतिष्ठा की कामना को ही लोकेषणा कहा जाता है। ये भी एक बड़ी खतरनाक कामना है। विशेषकर सरकारी या कॉरपोरेट अधिकारियों और रिटायर्ड टीचरों में ये कामना अधिक पाई जाती है। ये विशेष मान-सम्मान, पद और पद से प्राप्त प्रतिष्ठा इन अधिकारियों को कुछ वर्षों की एक तय सीमा में ही मिलता है। जब तक नौकरी रहती है लोग इनके आस पास बने रहते हैं और उन्हें आवश्यकता से अधिक मान सम्मान भी प्राप्त होता रहता है। लेकिन इस तय शुदा समय सीमा के बाद लोक सम्मान में बहुत कमी आ जाती है। कई रिटायर्ड लोग इस समस्या से बहुत लंबे समय तक जूझते देखे गए है। अगर इस लोकेषणा को समय रहते ही त्याग दिया जाए तो जिंदगी थोड़ी आसान हो सकती है, वानप्रस्थ संवर सकता है।
पुत्रैषणा: इसका मतलब सिर्फ पुत्र मोह ही नहीं है। पुत्रैषणा मतलब संतान और परिवार से मोह भी है। इस इच्छा को कौन सांसारिक व्यक्ति नकार सकता है!? ऐसा नहीं हो कि पुत्रैषणा पालते हुए धृतराष्ट्र ही बन जाएं। बस पुत्रैषणा का अतिरेक नहीं होना चाहिए।
यह तीनों इच्छाएं (पुत्रैषणा, लोकेषणा और वित्तेषणा) जब अमर्यादित हो जाती हैं, तो वे असंतोष का कारण बनती हैं। हालाँकि, यदि ये इच्छाएं सही और मर्यादित रूप में ही हों, तो व्यक्ति आत्म-संतोष और आत्म-कल्याण के लिए प्रयास कर सकता है।
बस हमें यही लगता है कि वानप्रस्थ ही Art of Leaving है और सही Art of Living भी यही है।
लोभ, ग़म, ईर्ष्या जैसे अवांछित नकारात्मक गुण और ऊपर लिखी इच्छाओं का धीरे-धीरे त्याग करते चलें, छोड़ते चलें। तब जीवन के सर्वोच्च पड़ाव यानी मृत्यु के सानिध्य में दुनिया को भी छोड़ देना आसान होगा।
अजी छोड़िए, त्यागिए गंभीर बातें! वानप्रस्थ के साथ-साथ जीना भी जरूरी है! गाना सुनते सुनते बात खतम करते हैं। इस गाने में भी छोड़ने की बात की गई है। और ये गाना है: छोड़ो सनम काहे का ग़म जिसे एनेट पिंटो और किशोर कुमार ने खूब गाया है। ( याद है ना वो तवा संगीत का एनेट पिंटो वाला ब्लॉगपोस्ट?)
अगली पोस्ट में फिर 'त्याग' की बात करेंगे लेकिन एक अनछुए परिप्रेक्ष्य में! उसे पढ़ना अनिवार्य है! उसे बिल्कुल नहीं छोड़ना है! समझे!?
पंकज खन्ना
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