(4) ब्रह्म पुरीष या बम्पुलिस?

पंकज खन्ना
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          बम पुलिस/बम्पुलिस

पिछली ब्लॉग पोस्ट में  Art of Leaving, वानप्रस्थ और त्याग के बारे में चर्चा की गई थी। आप और हम अच्छे से जानते हैं कि मनुष्य के लिए वानप्रस्थ, त्याग और संन्यास कितना कठिन है।

मानव सिर्फ मलमूत्र का त्याग ही सहर्ष करता है! और इसके कुशल विसर्जन के लिए हजारों सालों से प्रयत्नशील है। 

और हजारों साल के प्रयत्नों के बाद भी पूर्ण रुप से अब तक सफल नहीं हो पाया है। कोशिश जारी है और इसी संदर्भ में सन 2001 से दुनिया में World Toilet Day भी मनाया जा रहा है, जिसका एक टारगेट है: "End open defecation and provide access to sanitation and hygiene." भारत सरकार भी निश्चित ही इस दिशा में काफी अच्छा कार्य कर रही है।🙏

सोचा, आज 19 नवंबर 2025 को  World Toilet Day के अवसर पर पुराने  जमाने के बम्पुलिस/बम पुलिस को याद कर ही लिया जाए। 

इस 'त्याग और विसर्जन' के विषय पर आज सबसे पहले इस  बम्पुलिस शब्द से पुनः परिचय प्राप्त करते हैं क्योंकि नई पीढ़ी इस शब्द से शायद अनजान ही है।

आज से  पचास साल पहले ये एक सामान्य शब्द था। इसका मतलब था और आज भी है: सार्वजनिक शौचालय। 


 ( 1950 के दशक का शहरी बम्पुलिस)

आजादी से पहले और आजादी के बाद के कुछ दशकों में मैला ढोने ( Manual Scavanging) की कुप्रथा थी। (आज भी कानूनी प्रावधानों के बावजूद, अपवाद स्वरूप कुछ स्थानों पर ये कुप्रथा जारी है। भारत में आज भी लगभग 40000 कर्मचारी इस अमानवीय कार्य में संलग्न हैं।) 

इन बम्पुलिस या सार्वजनिक शौचालयों  को भी पहले इसी मैला ढोने वाली कुप्रथा से साफ किया जाता था।

इस बम्पुलिस या बम पुलिस शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? इस पर विद्वानों ने अपने-अपने विचार रखे हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त 1907 – 19 मई 1979) के अनुसार बम्पुलिस शब्द की उत्पत्ति 'ब्रह्म पुरीष' से हुई है।

ब्रह्म पुरीष! 'ब्रह्म' शब्द पढ़कर आप बहुत खुश हो गए होंगे। शायद आप सोच रहे होंगे आज तो जीवन का ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होगा। ब्रह्म ज्ञान और वो भी हम से!? हे हे हे! आप इस बरम/भरम या भ्रम में बिल्कुल न रहें। यहां बात पुरीष की हो रही है। और शायद आप इसे न ही झेल पाएं! चाहें तो अभी से कलटी मार दें।

आप जानते हैं ना पुरीष का मतलब!? नहीं!?  पुरीष का मतलब होता है: मल, विष्ठा, पॉटी, स्टूल, लैट्रिन आदि।

अब पुरीष के आगे ब्रह्म क्यों लगा दिया गया है!? अति संक्षेप में बताने की कोशिश करता हूं। प्राचीन काल में यज्ञकर्ता ब्राह्मणों के लिए बनाए गए शौचालयों को 'ब्रह्म पुरीष' नाम दिया गया था।

संभवतः इसी ब्रह्म पुरीष का अपभ्रंश है बम-पुलिस या बम्पुलिस। अब तो ये शब्द अपवाद स्वरूप ही कही-कहीं, कभी-कभी उपयोग में आता है। लेकिन हमारे बचपन में ये शब्द काफी प्रचलन में था। मोहल्ले के कई घरों में कच्चे यानी मैला ढोने वाले शौचालय भी नहीं हुआ करते थे। जिन घरों में शौचालय नहीं हुआ करते थे वहां के रहवासी दूर कहीं खुले में या बम्पुलिस में जाया करते थे।

(मोहल्ले के बम्पुलिस की काल्पनिक फोटो)

आजादी के पहले के कुछ अंग्रेज़ लेखकों के अनुसार कुंभ के मेले के दौरान चार Bamboo Poles और टाट पट्टियों से ऐसे अस्थाई शौचालय बनाए जाते थे। उनके अनुसार बम्पुलिस शब्द की उत्पत्ति इन्हीं Bamboo Poles से हुई है। और काफी भारतीय और अंग्रेज़ लेखकों के अनुसार बम्पुलिस शब्द Bund Place से बना है।

अधिक संभावना तो यही है कि ब्रह्म पुरीष से ही बम्पुलिस बना होगा। आखिर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तो यही बता कर गए हैं। लेकिन ये भी याद रहे कि बम बम भोले के बम शब्द की उत्पत्ति ब्रह्म से नहीं हुई है। पता नहीं बम्पुलिस शब्द की उत्पत्ति के पीछे का अंतिम सच क्या है। यहां हम सब लोग बस गैस ही छोड़ सकते हैं!

ये भाषा बड़ी विचित्र वस्तु होती है। हिंदी और अंग्रेजी के बीच में झूलते हुए ऐसे कई शब्द बड़े मनोरंजक होते हैं। आज के जमाने में अगर ये बम पुलिस वाला शब्द उपयोग में होता तो इसपर बड़ी-बड़ी रीलें और छोटे-छोटे मीम बन जाते और लोग जरूर पूछते: 'बम' के पीछे पुलिस!? और शायद मॉडल्स के रैंप वॉक को देखकर भी मनचले कह देते: बम पुलिस! यूपी पुलिस के लिए ये स्लोगन भी बन जाता: आप बम फोड़ेंगे तो हम बम तोड़ेंगे! लोग यूपी पुलिस को ही बम पुलिस कहने लगते!!अच्छा हुआ कि बम्पुलिस शब्द अब सिर्फ इतिहास की बात है! 

वैसे आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस भी है। लेकिन आज तो पुरीष, पुरुष पर कही ज्यादा भारी है!!😂

पुरीष की गंध दिलो दिमाग पर अधिक ना छा जाए इसलिए एक सुंदर शिव भजन सुनते चलते हैं। बम की बात चल रही है तो बम बम भोले के नाम पर ही एक उम्दा भजन सुन लेते हैं: बबन बबम बम बम लहरी।  फिल्म : रामू दादा(1961)।  

(चाहें तो इसी शिव भजन को महेंद्र कपूर की आवाज में भी सुन सकते है। कैलाश खैर की आवाज में भी इसे सुना जा सकता है: बबम बबम बम बम लहरी। )

बम्पुलिस और मैला ढोने की प्रथा का बहुत लंबे समय तक आजादी के बाद भी बने  रहना और आज के जमाने में भी दुनिया भर में यूनाइटेड नेशन्स द्वारा टॉयलेट डे मनाने की जरूरत होना समाज की एक बेहद कड़वी और दुखभरी सच्चाई है। 
चलो अंत में अब  ऑस्कर विनर फिल्म स्लमडॉग मिलिनियर की तरफ रुख करते हैं। इस फिल्म में गड्ढे वाले बम्पुलिस या  सार्वजनिक शौचालय का चित्रण किया गया था। उसे सुंदर चित्रण तो नहीं कह सकते हैं ना! इसलिए सिर्फ चित्रण ही लिखा है! याद है न कैसे इस फिल्म में बालक जमाल पुरीष के ढेर में छलांग मार देता है!? भूल गए!? चलिए ये क्लिप देख लीजिए। सब याद आ जाएगा! ( बताते चलें कि फिल्म में बच्चे के लिए चाकलेट का ढेर रखा गया था, पुरीष के रंग में।)

पुराने जमाने के शारीरिक मैल वाले बम्पुलिस तो चले गए। मैला ढोने की प्रथा भी लगभग समाप्त हो गई। खुले में शौच की प्रथा भी समाप्ति की ओर है। लेकिन मानसिक पुरीष या मानसिक मैल वाले बम्पुलिस आज बढ़ते ही जा रहे हैं। आशय WhatsApp और Facebook के विभिन्न ग्रुप्स से है।  बहुत सारे ऐसे ग्रुप्स को 'बम्पुलिस' नाम दिया जा सकता है जहां सिर्फ सड़ांध या मानसिक मैल धड़ल्ले से फेंक दिया जाता है और एक दूसरे को इसमें पटक दिया जाता है।

कुछ बहुत अच्छे ग्रुप्स में भी कुछ विघ्न संतोषी लोग ऐसा मानसिक पुरीष जानबूझकर छोड़ जाते हैं। इतनी दुर्गंध होती है कि ग्रुप क्षमा  याचना के साथ छोड़ना पड़ जाते हैं।🙏

इति ब्रह्म पुरीष:। इति बम्पुलिस:।🙏🙏

अंत में आपको अंदर की बात बताता चलता हूं। अंग्रेज़ हमारे भारत से बहुत कुछ चुरा ले गए, सभी जानते हैं। लेकिन जाते-जाते वो हमारा पुरीष भी ले गए। मतलब ब्रह्म पुरीष! और अब वो इसे बोलते हैं: Holy Shit!

भारत के हर नागरिक को ये बात मालूम होनी चाहिए;)

(अगले अंक में हम चर्चा करेंगे हमारे पारसी मोहल्ले के  मैला ढोने वाले कर्मचारी और बालसखा स्व. हौआ और उनके परिवार वालों के  बारे में। सबसे पहले बोले तो उनका शेर नाचा!🙏)


पंकज खन्ना
9424810575

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