(2) छोड़ने की कला!

पंकज खन्ना
9424810575

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(3) Art of Leaving: वानप्रस्थ.12/11

पिछले अंक से जारी...

छोड़ने की कलाएं कई टाइप की हो सकती हैं। क्रमानुसार नीचे पढ़ें:

(1) डामिस पिंचिस ने पिछला आर्टिकल पढ़ लिया है।और वो लगातार फोन कर रहा है। के रिया है कि वो तो बचपन से जानता है छोड़ने की कला! बोलता है कि अब उसके आर्केस्टा में इस कला का प्रदर्शन भी करेगा!

पता नहीं उसके मन में छोड़ने की कला से क्या मतलब निकल रहा है। लेकिन असल में पिंचिस को पेचिस ( पेचिश, Dysentry) होती रहती है और वो छोड़ता रहता है! उसका तो ऐसा ही है कि  जब मन में आया महफिल में छोड़ दी और लोगों को बेहोश कर दिया।

ये वाली छोड़ने की कला तो पिंचिस को ही मुबारक हो भिया! इनने तो Art of Living की जगह Fart of Living की कोचिंग शुरू की हुई है! छोड़ दो उसे और छोड़ने दो उसे!

(2) छोड़ने की कला का दूसरा  मतलब घर, चौपाल, पार्लियामेंट, स्कूल,  कॉलेज, ऑफिस में बैठकर डींगे हांकना या लंबी लंबी फेंकना भी होता है। ये वाली छोड़ने की कला हम सभी  प्रतिदिन ऑफिसों, बाग बगीचों, टीवी, WhatsApp, Facebook और Instagram आदि नाम के नवीन  चंडूखानों में देखते पढ़ते  रहते हैं। इस प्रकार की  छोड़ने की कला को भी यहीं छोड़ देते हैं; ऑफिस, टीवी या सोशल मीडिया रूपी चंडूखाने में ही।

(3) आज के इन चंडूखानों  के दौर में उड़ते तीरों से बचे रहना और उन्हें धारण नहीं करना ही छोड़ने की कला है! हमारे आगाह करने के बाद भी आप मानोगे तो नहीं! आप हमेशा के समान उड़ते तीरों को धर दबोचेंगे, हम जानते हैं! आपकी मर्जी!

ऊपर की तीनों छोड़ने की कलाएं थोड़े से हल्के फुल्के अंदाज में लिखी गई हैं। ये आप छोड़े या ना छोड़ें, कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण छोड़ने की कला है वो नीचे चौथे पॉइंट में लिखी गई है।

(4) दरअसल छोड़ने की कला से हमारा आशय  सिर्फ और सिर्फ Art of Leaving से है भिया। और ये थोड़ा गंभीर विषय है।

सन 1988 की बात है। तब हिंदुस्तान पेट्रोलियम ( HPCL) में अफसरी करते थे। काम भी करते थे! HPCL का निगडी (पुणे) में मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट है जहां हर साल एक या दो या और अधिक बार अफसरों को बारी-बारी से ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाता था। ट्रेनिंग देने के लिए कंपनी के अधिकारी, रिटायर्ड अधिकारी,और  मैनेजमेंट/अन्य फील्ड के विद्वानों/विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाता था। 

ऐसे ही किसी प्रोग्राम में शीघ्र ही HPCL से रिटायर होने जा रहे एक अधिकारी, जो हमारे ट्रेनर थे,  के मुंह से 'Art of Living' के बारे में पहली बार सुना। उन्होंने काफी फंडे भी ठेल दिए इस विषय पर। आखिर रिटायरमेंट के बाद उन्होंने इसी और अन्य विषयों पर भी HPCL में ट्रेनिंग देने की जुगाड करनी थी। 

कुछ  साथी अफसरों को ये फंडे काफी पसंद भी आए। बाकी एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे। इंदौर के पारसी मोहल्ले में बने-बिगड़े इस हर हाल में खुश रहने की कोशिश करने वाले प्राणी को भी ये बात  कुछ जंची नहीं। पहले बच्चों के लिए पढ़ाई की कोचिंग और अब बड़े लोगों के  लिए भी धर्म की कोचिंग या जीने की कला की कोचिंग!? और इसके लिए भी हफ्ते भर या महीने भर की कक्षाएं!? और वो भी पईसे देकर, भले ही वो कंपनी दे ये कोई व्यक्ति!?

तब 26 साल के उम्र में यही लगता था और आज 63 साल के उम्र में भी यही लगता है कि बस छोटा सा घर परिवार हो, कुछ दोस्त हों, उमंग और उत्साह के साथ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें; तथा अच्छा और बुरा समय एक समान झेल लें। कभी संदेह हो तो गीता पाठ कर लें, दोस्तों और घर वालों से सलाह कर लें। बस यही है Art of Living या जीवन जीने की कला।

उन विद्वान को हमने ट्रेनिंग के दौरान सुझाव दिया कि दुनिया को Art of Living के साथ साथ  Art of Leaving की भी जरूरत है। उन्हें वानप्रस्थ के बारे में बताया। वो तो तुनक गए, फट पड़े, बरस पड़े, दिल पर ले लिया। लगे चिल्लाने जैसे किसी ने उनकी उंगली काटकर उसपर नमक मिर्ची छिड़क दी हो! उन्हें धर्म और मैनेजमेंट की बातों पर विचार रखने का एकाधिकार प्राप्त था। वो कंपनी के साब लोगों के भी चहेते थे। और उन्हें इस बात के पईसे भी मिल रहे थे। उन्होंने फिर सफलतापूर्वक हमारी काफी इज़्ज़त उतारी, भरी क्लास में! ऐसा उन्हें लगा!!

हम ठहरे सरकारी स्कूल वाले और ऊपर से पारसी मोहल्ले के मुजोर (मुंह-जोर, बकवादी) छिछोरे छोरे! इज़्ज़त हुज़्ज़त गई तेल लेने! हारने का तो कोई विकल्प ही नहीं होता था उस उम्र में। हमें तो बस मुजोरी करने का मौका मिल जाए! बाकी सब देख लेते थे! 

उन्हें  वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम  याद दिलाने के बाद भी कुछ फायदा नहीं हुआ। वो बरसते रहे, बिलखते रहे। धर्म की दुहाई देते रहे!  याद दिलाए गए वानप्रस्थ के सिद्धांत में उन्हें धर्म नहीं दिखा। लेकिन हमारा स्वतंत्र विचार उन्हें बड़ों का अनादर और धर्मविरुद्ध लगा!! (तभी सोच लिया था कि कभी Art of Leaving पर जरूर लिखा जाएगा। सैंतीस साल गुजर गए! पर अब  लिख रहे हैं, वानप्रस्थ के दौर में। आलस की भी हद्द होती है!)

शाम को क्लास के बाहर आकर  दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जीत की घोषणा कर दी और हमने तो उत्सव भी मनाया! उत्सव मतलब वही: दोस्तों के साथ बैठकर सोमदेव और God  Bacchus  को दिल से याद करना! हार हो या जीत; बस उत्सव मनाना ही जीने की कला है। 
पाकिस्तान भी बहुत एक्सपर्ट है इस क्षेत्र में! अगर गीता, या ऐसी क्लासेस से न सीख पाएं तो पाकिस्तान से ही सीख लें। हारते रहते हैं और तमगे लगाते रहते हैं! वो विद्वान गुरु भी ऐसे ही थे! कंसल्टेंट थे ना! (याद है न वो कंसल्टेंट वाला जोक जो चंडूखानों में हर साल दोहराया जाता है!? )

Art of Living  देश में श्रद्धा के साथ अधिक समझा और परखा जाता है लेकिन जीवन में कम ही  उतारा जाता है। इसको  एक अल्हड़, अक्खड़, नादान जवान ही भरी सभा में नकार सकता था। और वो अक्खड़ आज भी अपनी उन दिनों की नादानियों पर गर्व करता है!

लेकिन आप भी मानेंगे कि Art of Leaving भी  काफी महत्वपूर्ण है। ये विचार शास्त्र सम्मत है और धर्मानुसार है। भले ही  बाबा लोग हमारी बात को धर्म विरोधी और देश विरोधी भी बता दें लेकिन हमारे हिसाब से  Art of Leaving ही सबसे बड़ा Art of Living है।

हिंदू धर्म की प्राचीन अवधारणा 'चतुराश्रम' में जीवन की बहुत अच्छी बातें  समझाई गई हैं। चतुराश्रम का अर्थ "जीवन के चार आश्रम" या मानव जीवन के चार चरणों से है, जो हैं: ब्रह्मचर्य (जन्म से 25 वर्ष तक), गृहस्थ (25 से 50 वर्ष तक), वानप्रस्थ (50 से 75 वर्ष तक) और संन्यास ( 75 वर्ष से 100 वर्ष तक)। ये आश्रम व्यक्ति को जीवन के विभिन्न चरणों में अपने कर्तव्यों और लक्ष्यों के अनुसार मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। 

वानप्रस्थ के  तीसरे चरण में व्यक्ति सांसारिक जीवन से धीरे-धीरे दूर होकर एकांत और चिंतन करते हुए संन्यास की ओर बढ़ता है। 

संन्यास यह जीवन का अंतिम चरण है, जिसमें व्यक्ति सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह से संन्यास ग्रहण कर लेता है।*

अभी चर्चा को यहीं रोकते हैं। अगली पोस्ट में और विचार करेंगे वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम पर। बोले तो, Art Of Leaving पर बकवादी करेंगे।

जाते-जाते, दो अच्छे गाने  सुन लेते हैं छोड़ने पर!

आपको याद है ना वो आपके लिए ही गाती थीं: छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा। आप भी संग-संग गाते थे! शायद ये भी गाती थीं: छोड़ो छोड़ो मेरी राहें मेरी बाहें।  आप फिर सुन लीजिए। पुराने दिन याद कीजिए। 

और फिर अगले अंक में बातें करेंगे Art Of Leaving और वानप्रस्थ पर!



पंकज खन्ना
9424810575


मेरे कुछ अन्य ब्लॉग:

हिन्दी में:

तवा संगीत : ग्रामोफोन का संगीत और कुछ किस्सागोई।
रेल संगीत: रेल और रेल पर बने हिंदी गानों के बारे में।
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तवा भाजी: वन्य भाजियों को बनाने की विधियां!
मालवा का ठिलवा बैंड: पिंचिस का आर्केस्टा!
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अंग्रेजी में:

Love Thy Numbers : गणित में रुचि रखने वालों के लिए।
Love thy Squares: All about Magic Squares.
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।

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*लेकिन अब हम हिन्दुओं के बाबा लोग सिर्फ दो ही आश्रम में विश्वास रखते हैं: शुरआती जीवन का ब्रह्मचर्य आश्रम और फिर ताउम्र आनंद आश्रम, तमाम भौतिक सुख सुविधाओं के साथ।

लगभग सभी बाबा भौतिक और सांसारिक सुविधाओं का उपभोग करके उनके  आलीशान महलों में अपार धन दौलत के बीच रहकर बगैर वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम को अपनाए, वहीं महलों में या किसी बड़े हॉस्पिटल में अपने प्राण त्यागते हैं। आनेवाले समय में भी बाबा लोग यही करने वाले हैं। 

बाबा लोगों का अनुसरण करते हुए आम आदमी भी अब सिर्फ भौतिक सुख सुविधाएं ही ढूंढता है। कोई बाबा स्वयं के वानप्रस्थ और संन्यास की तो  बात ही नहीं करता, लेकिन सनातन और हिंदू धर्म की बातें आम आदमी पर थोपे जाएंगे । यही कारण है कि आज के आम  आदमी के लिए  किसी भी वस्तु का त्याग करना अत्यंत मुश्किल काम है। प्राण त्यागते की बात तो करना ही नहीं है। ऐसा लगता है सब अपने-अपने  बाबा लोगों के आशीर्वाद से  माथे पर अमर पट्टा लिखवा लाए हैं। दुनिया छोड़ जाने की कुछ तैयारी कहीं दिखाई नहीं देती।

लेकिन तैयारी करनी तो होगी। वानप्रस्थ को अच्छी तरह से समझना और जीना होगा। इस संबंध में जरूर पढ़ें अगला ब्लॉग पोस्ट: Art Of Leaving: वानप्रस्थ!

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