(1) प्रस्तावना।
पंकज खन्ना 9424810575 अगले/पिछले ब्लॉग पोस्ट: (1) प्रस्तावना : कुछ भी! 10/10/25 (2) छोड़ने की कला ।17/10/25 (3) Art of Leaving : वानप्रस्थ.12/11 (4) बम पुलिस या बम्पुलिस ! 19/11 अभी तक के हमारे सभी ब्लॉग ( तवा संगीत , रेल संगीत , साइकल संगीत , तवा भाजी , रेस कोर्स रोड इंदौर के पक्षी , Love Thy Numbers , Epeolatry , और CAT-a-LOG ) थोड़े विषयात्मक हैं। उनमें थोड़ी बहुत इधर-उधर की बातें तो की जा सकती हैं और की भी जाती हैं। लेकिन विषय पर बने रहना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि ऊपर लिखी इन ब्लॉग सीरीज में ' कुछ भी' या ' कुछ तो भी ' लिख दिया जाए। इंदौरी लोग इन वाक्यांश 'कुछ भी' या 'कुछ तो भी' का प्रयोग बहुतायत से कुछ ऐसे करते हैं: कोई लड़की अगर होनोलूलू टाइप की ड्रेस पहनकर, आत्मविश्वास और स्वेच्छा से इठलाती हुई नमूदार हो जाए तो भले इंदौरी लोग ऐसी ड्रेस को देखकर शर्माते हुए एक दूसरे से बोलेंगे: कुछ तो भी पेन रक्खा है इनने, भिया यार! और बुरे इंदौरी कुछ तो भी गंदा बोलकर अपना असली चेहरा दिखा देते हैं। होटल या किसी फ्री पार्टी में खा...