(1) प्रस्तावना।
(2) छोड़ने की कला।17/10/25
(3) Art of Leaving: वानप्रस्थ.12/11
(4) बम पुलिस या बम्पुलिस! 19/11
अभी तक के हमारे सभी ब्लॉग ( तवा संगीत, रेल संगीत, साइकल संगीत, तवा भाजी, रेस कोर्स रोड इंदौर के पक्षी, Love Thy Numbers,
इंदौरी लोग इन वाक्यांश 'कुछ भी' या 'कुछ तो भी' का प्रयोग बहुतायत से कुछ ऐसे करते हैं:
कोई लड़की अगर होनोलूलू टाइप की ड्रेस पहनकर, आत्मविश्वास और स्वेच्छा से इठलाती हुई नमूदार हो जाए तो भले इंदौरी लोग ऐसी ड्रेस को देखकर शर्माते हुए एक दूसरे से बोलेंगे: कुछ तो भी पेन रक्खा है इनने, भिया यार! और बुरे इंदौरी कुछ तो भी गंदा बोलकर अपना असली चेहरा दिखा देते हैं।
होटल या किसी फ्री पार्टी में खाना पसंद नहीं आया तो भर-भर के खाने के बाद डकार को नकार कर बोल देंगे: कुछ तो भी खिला दिया, भिया!
क्रिकेटर अच्छा नहीं खेल रहे होंगे तो लेटे-लेटे, पड़े-पड़े हमारे इंदौरी भिया बोल उठेंगे: कुछ तो भी टिचुक टिचुक खेल रिए हैं ये आलसी ओन।
डामिस पिंचिस इसे पढ़ेगा तो यही बोलेगा: कुछ तो भी अलता-भलता लिखते रहते हैं पंकच भिया! कुछ भी!
हमारी अर्धांगिनी डॉ. प्रीति खन्ना (पुराने जमाने की PhD Food and Nutrition में) जब पोहे में गाजर, मटर, टमाटर, अनार और अन्य सब्जियां डाल देती हैं तो हम उसल उपासक मन ही मन में बोल देते हैं: यार, कुछ तो भी! लेकिन ये मन की बात पता नहीं कैसे सब-टाइटल के रूप में माथे पर उभर कर ब्रेकिंग न्यूज के समान चल पड़ती है! वो पढ़ लेती हैं और घूर के देखती हैं। बोलती कुछ नहीं। लेकिन फिर भी हमें उनकी आवाज में बहुत जोर से सुनाई पड़ जाता है: 'नखरे देखो बुढ़ापे में! कुछ भी!'
पोहे में डबल झन्नाट उसल तरी डालकर खानेवाले मोहल्ले के पंकच भिया फिर सूम में बैठकर चुपचाप खा लेते हैं; कुछ तो भी!
सच में बहुत प्रभावी है ये वाक्यांश! वैसे भी हमारे समान साधारण आदमी का जीवन भी ऐसा ही होता है: कुछ तो भी!
बस इसी 'कुछ तो भी' टाइप के जीवन की यादें इस ब्लॉग में परोसी जाएंगी। इस ब्लॉग सीरीज में कोई एक विषय नहीं रहेगा। विषय कुछ भी हो सकता है। विषय बदलते रहेंगे, यादों की जनेत चलती रहेगी मतलब यादों का जुलूस/काफिला/ बवंडर। यादों की फिल्मी बारात भी निकलेगी। बातें इसी दुनिया की होंगी, सांसारिक होंगी। कुछ नई पुरानी जानकारियां होंगी, मोहल्ले की जिंदगी की शेष-विशेष यादें होंगी; स्मृति-विस्मृति होगी। पारसी मोहल्ले वाली स्मृति भी होगी! कुछ मौज मस्ती भी होगी और कुछ मनुष्य प्रजाति के दोगलेपन की बातें भी होंगी। लेकिन राजनीति की बातों से यहां भी परहेज रहेगा। बस देखते चलिए। पुराने दौर के तेली हैं, यही कहेंगे: "तेल देखो, तेल की धार देखो।"
कुल मिलाकर इस ब्लॉग में कुछ तो भी लिखा जाएगा। कुछ भी मतलब कुछ तो भी!
आप भी पड़े मत रहिए, पढ़ते रहिए! कुछ तो भी करिए। कुछ नहीं है करने को तो गाने सुनिए। खाइए, पीजिए, छोड़िए!मतलब पादिए!
बस शांत मत बैठो, दोस्त! दिल की गिरह खोल दो। चुप न बैठो।
मुर्दे ही शांत अच्छे लगते हैं! वो उठ गए तो बवाल! आप बैठ गए तो सवाल! इसलिए कुछ तो भी करते रहिए! और जो भी चाहे कहिए। हम सुनेंगे।
और तैयार रहिए! इस सीरीज का पहला विषय होगा: छोड़ने की कला! सोचते रहिए!
पंकज खन्ना
9424810575
मेरे कुछ अन्य ब्लॉग:
हिन्दी में:
तवा संगीत : ग्रामोफोन का संगीत और कुछ किस्सागोई।
रेल संगीत: रेल और रेल पर बने हिंदी गानों के बारे में।
साइकल संगीत: साइकल पर आधारित हिंदी गाने।
तवा भाजी: वन्य भाजियों को बनाने की विधियां!
मालवा का ठिलवा बैंड: पिंचिस का आर्केस्टा!
ईक्षक इंदौरी: इंदौर के पर्यटक स्थल। (लेखन जारी है।)
अंग्रेजी में:
Love Thy Numbers : गणित में रुचि रखने वालों के लिए।
Love thy Squares: All about Magic Squares.
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।